Bastar

सिलेगर के ग्रमीणों की आवाज दबाने कलेक्टर की है साजिश,संविधान को चुनौती पत्रकार पर रोक

डीआरजी जवानों की हैवानियत, डण्डे से पीटकर गर्भवती महिला को उतारा मौत के घाट: ग्रामीण

बस्तर। जल,जंगल और जमीन बरसों से इसके संरक्षण को लेकर चले आ रहे हैं आदिवासियों का संघर्ष आज पर्यंत जारी है। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की पहचान जंगल से है और वह किसी भी हालत में अपने इस स्वर्ग रूपी जंगल और जमीन को ऐसे हाथों में नहीं सौंपना चाहते जो उनके इसे उजाड़ दे। यही कारण है कि हर परिस्थिति में चाहे बरसात हो या कड़कती धूप ही क्यों ना हो यह हर हालत में अपने हक के लिए समर्पित रहे हैं हाल ही में इसका जीता जागता उदाहरण बीजापुर जिले के अंतर्गत आने वाले सिलगेर में देखने को मिल रहा है जहां पर अपनी जमीन सरकार से बचाने के लिए कैंप हटाने के विरोध में पिछले 26 दिनों से स्थानीय ग्रामीण यहां पर आंदोलनरत हैं इस बीच उन्हें अपने तीन ग्रामीण साथियों के जान से भी हाथ धोना पड़ा लेकिन बावजूद इसके ग्रामीण बरसते पानी में भी अपने हक के लिए डट कर आवाज उठाने से पीछे नहीं हटे। सिलगेर पर सियासत लगातार गर्माते जा रही है। गोली कांड में तीन ग्रामीणों की मौत के बाद जहां उनके अंतिम संस्कार के लिए सरकार ने उनके परिवारों को 10-10 हजार रुपये मुहैया करवाया तो वही पुलिस उन ग्रामीणों को अब भी नक्सली करार दे रही है हालांकि अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है। वही ग्रामीणों ने बस्तर सांसद दीपक बैठ के अध्यक्षता में बनी 9 सदस्य जनप्रतिनिधियों की टीम के सामने भी अपनी शर्तें रख जांच की रिपोर्ट मांगी है और जांच टीम ने सरकार को अपने जांच की रिपोर्ट भी सौंप दी।

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकार जिसका सरोकार हर वो घटना से है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सरकार और जनता को प्रभावित करती है। लोगों की आवाज बन कर उनकी तकलीफों को सरकार तक पहुंचने का काम पत्रकार करते हैं लेकिन बीजापुर कलेक्टर इन पत्रकारों को ही दबाने का प्रयास करते नजर आए। सिलगेर में आंदोलनरत ग्रामीणों से मिलने जाने के लिए पत्रकारों को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा कलेक्टर ने तर्रेम चेक पोस्ट के पास ही हमारी टीम को यह कह कर रोक लिया कि आगे कंटेनमेंट जोन है इसलिए वहां जाने का परमिशन नहीं दे सकते। लेकिन सिलेगर से आने वाले लोगों पर रोक नहीं लगा सकी। वहीं ग्रामीणों की मध्यस्थता टीम के सामने कलेक्टर झूठ बोलते तक नजर आए कि पत्रकारों को जाने से नहीं रोका जा रहा है ऐसा करके ना सिर्फ कलेक्टर ने पत्रकारों की छवि खराब करने की कोशिश की है बल्कि पत्रकारों और ग्रामीणों को गुमराह करने की भी कोशिश की।

लेकिन 5 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद हमारी टीम सिलगेर में आंदोलनरत ग्रामीणों के पास पहुंची जहां पर कई नए खुलासे हुए एक ओर जहां 3 ग्रामीणों की मौत की बात उभरकर सामने आ रही है तो वहीं इस बात का भी खुलासा हुआ कि पुलिस द्वारा सिलगेर में ग्रामीणों पर इस तरह से बर्बरता पूर्व व्यवहार किया गया लाठियां बरसाये गए कि 3 माह की गर्भवती महिला की भी मौत हो गई इस मामले को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन नहीं चाहती सच लोगों तक पहुंचे यही कारण है कि पुलिस प्रशासन झूठ और मनगढ़ंत कहानी बनाकर लोगों को और सरकार को गुमराह करने की कोशिश कर रही है और यही कारण है कि पत्रकारों को हम तक नहीं पहुंचने दिया जा रहा है। पत्रकारों को मौके पर जाने से रोकना यह कहीं ना कहीं डीआरजी के जवानों और कलेक्टर के गलत क्रियाकलापों की ओर इशारा करती है सच को दबाने की भरकस कोशिश कलेक्टर द्वारा की जा रही है।

लगातार आग की लपटों की तरह सुलग रहे सिलगेर में चल रहे संशय के बीच आज आईडीपी ट्वेंटी फोर न्यूज़ की टीम आखिरकार सिलगेर पहुंची और यहां पहुंच कर हमारी टीम ने ग्रामीणों से इस विषय में भी चर्चा की,कि आखिर जवानों के कैंप लगने से उन्हें क्या परेशानी है। ग्रामीणों का कहना है कि कैंप के एवज में सरकार ग्रामीणों के जमीनों का अधिग्रहण करती है साथी ब्राह्मणों का कहना है कि जवानों द्वारा उनके साथ बर्बरता पूर्वक व्यवहार भी किया जाता है। इस पूरे मामले में जवानों का कहना है कि यह सारे क्रियाकलाप नक्सलियों के मार्गदर्शन में हो रहा है लेकिन वहीं कुछ दिन पहले स्वयं नारायणपुर जिले के कांग्रेस विधायक चंदन कश्यप ने कहा था कि पुलिस ग्रामीणों को नक्सली बता रही है पुलिस नारायणपुर के ओरछा और नारायणपुर ब्लाक में कई लोगों को घरों से ले जाकर नक्सली घोषित कर रही हैं कश्यप के इस बयान से छत्तीसगढ़ का सियासी पारा चढ़ना तय माना जा रहा है क्योंकि यह गंभीर आरोप विपक्ष ने नहीं बल्कि कांग्रेस के ही विधायक ने लगाया है।

अब इन दो अलग-अलग मतों के बीच किन की बातों में सच्चाई है इसका अंदाजा वर्तमान में लगा पाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन कांकेर से सिलगेर जाने वाले मार्ग में हर 1 किलोमीटर के दायरे में जो चेकपोस्ट है वहां पर जवानों द्वारा पूछे जाने वाला प्रश्न थोड़ा अजीब जरूर लगा।

हर चेकपोस्ट में जवान द्वारा हर गाड़ी को रुकवा कर यह प्रश्न जरूर किया गया कि इस गाड़ी में कोई नेता तो नहीं! लेकिन जवानों द्वारा पूछा गया यह सवाल किस बात की ओर इशारा करता है यह उलझन का विषय जरूर है।

बहरहाल अब देखना यह होगा कि बीजापुर के सिलगेर से उठी आंदोलन की यह आग कब तक शांत होती है और सरकार कब इन ग्रामीणों को उनका सन्तुष्टिजनक जवाब दे पाती है।

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