Raipur

एक बार फिर बिकाऊ पुलिस के सामने झुकी कलम,थाने में रसूखदारों को बैठा कर पत्रकारो पर करते है दबंगई

रायपुर। पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर राजधानी शर्मसार हो गई जिस कलम की ताकत को प्रदेश सरकार भी नहीं भाप पाई ऐसे में भला रसूखदार कहां अपनी मनमानी करने से बाज आने वाले हैं। पत्रकार कानून लाने की बात भूपेश सरकार अपने हर भाषण में कहते रहती है लेकिन पत्रकार सुरक्षा कानून तो दूर की बात पत्रकारों के साथ होने वाली हिंसा तक को रोक पाना शायद सरकार के लिए अब नामुमकिन सा होता जा रहा है यही कारण है कि सच्चाई को सरकार तक पहुंचाने वाले यह पत्रकार अब खुद रसूखदारों के लपेटे में इस हद तक आ रहे हैं कि पत्रकारों के ऊपर कोई भी धारा लगाकर जबरदस्ती पुलिस थाना में बैठा कर प्रताड़ित करने का काम किया जा रहा है।

पुलिस वाले एक पत्रकार को इस तरह से रेकी करके पकड़ रहे हैं जैसे कि वह कोई आदतन अपराधी हो या किसी बहुत बड़े अपराध को अंजाम देकर कहीं छिपा हुआ हो अगर इतनी ही तत्परता से पुलिस वाकई में अपराध करने वाले, लड़कियों की इज्जत लूटने वाले ऐसे अपराधियों पर अपना शिकंजा कसने में जोर लगाती तो शायद आज राजधानी में अपराध का लेवल बढ़ने के बजाय गर्त में जाता नजर आता। लेकिन शर्म की बात तो यह है कि यह पुलिस भी पैसे वालों रसूखदार के हाथों बिक गई हैं इसमें यह कहना कहीं भी दो राय नहीं है कि पुलिस अब अपराधियों को सजा दिलाना छोड़ रईसों की कठपुतली बन उनके इशारों में नाचने का काम कर रही है। बता दे कि 1 माह पूर्व नेशन अपडेट ने एक खबर प्रकाशित किया था। दरअसल वीआईपी रोड स्थित अबोव एंड बियोंड नामक होटल में सरकार द्वारा तय की गई समय सीमा को ताक में रखकर रात रात भर लड़के लड़कियों को शराब पार्टी करवाया जाता है जिनका कवरेज नेशन अपडेट के पत्रकार शहबाज अली ने किया था जिसके बाद प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर निशान अपडेट ने तत्परता से इस खबर को प्रकाशित भी किया गया लेकिन खबर प्रकाशन के 1 माह बाद पुलिस प्रशासन या यूं कहें कि होटल के मालिक नींद से जागे और खबर प्रकाशित होने के एक माह बाद फर्जी f.i.r. दर्ज करवा कर नेशन अपडेट के संवाददाता शहबाज अली आज तक के पत्रकार विनोद नामदेव और साजिद नामक व्यक्ति को सलाखों के पीछे डाल दिया लेकिन जिस तरह से एक पत्रकार को सलाखों के पीछे डालने का रवैया पुलिस ने अपनाया वह बेहद ही निंदनीय था।

वहीं दूसरी ओर पुलिस वालों की क्षुद्रता इस हद तक देखने को मिली जो बेहद ही शर्मनाक करने वाली है। एक पत्रकार की आबरू को इस हद तक छलनी करना कि वह सच दिखाने से पहले 100 बार सोचे पुलिस वालों का यह नाजायज हरकत न सिर्फ अपमानजनक है बल्कि आपराधिक भी है। लेकिन भले ही कोई लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए आवाज उठाए या न उठाए लेकिन एक पत्रकार हमेशा एक पत्रकार के साथ खड़ा होता है इस बात का सबूत उस वक्त मिल गया जब एक बड़ी तादाद में पत्रकार अपने पत्रकार साथी को छुड़ाने के लिए माना थाने पहुंचे और वहां पहुंचते ही भूपेश बघेल मुर्दाबाद और माना टीआई मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए अपनी कलम को थाने में ही नीचे रख दिया इसके बाद सभी पत्रकार मुख्यमंत्री के निवास स्थल भी पहुंचे लेकिन वहां से उन्हें दुत्कार कर बाहर भगा दिया गया। लेकिन इसके बावजूद भी सरकार मौन है।

जो गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू यह कहते फिरते थे कि जिस भी थाना अंतर्गत प्रतिबंधित नशीले शराबों की बिक्री होगी सबसे पहले वहां के थानेदार को ही निलंबित किया जाएगा वह भी इस मामले में मौन बैठे हुए हैं और वही थाना के टीआई मजे से रसूखदार के फेंके हुए पैसों में लाल हुए रसूखदार को बैठाकर पत्रकार को जलील करवाने का काम कर रहे हैं

और तो और अब पुलिस वालों को प्रार्थी उनका काम सिखाते नजर आते हैं किन को कितना लंबा घसीटना है और कितना मानहानि लगाना है यह चर्चा भी अब पुलिस वालों के साथ प्रार्थी बड़ी आसानी से करते हैं एक बड़े रसूखदार और पुलिस का यह याराना बहुत कुछ बयां करता है यह तो समझने वालों के इशारा ही काफी है। अब कहां गए गृह मंत्री के वह बोल जिसमें बड़ी-बड़ी बातें करके, वाहवाही लुट के जनता को बेवकूफ तो बनाया जाता हैं लेकिन जब वास्तविकता में नशीले पदार्थों की बिक्री का पर्दाफाश कर पत्रकार प्रशासन के सामने उजागर करता हैं तो ऐसे थानेदारों पर कार्यवाही करना छोड़ उल्टा पत्रकारों पर ही वसूली का गाज गिरा दिया जाता है।

सरकार को पत्रकारों की याद तब आती है जब उनको अपनी तारीफ के पुल बनवाकर जनता को आकर्षित करना होता है या फिर अपनी योजनाओं का बड़ा प्रचार प्रसार कर अपना विज्ञापन कराना होता है लेकिन जब उस पत्रकार पर गाज गिरती है तब सरकार ऐसे मामले में कन्नी काट कर चुप हो जाती है पुलिस प्रशासन को किसने हक दिया की वह पत्रकार के साथ बदसलूकी करें जिस तरह वह देश की सेवा कर रही है उसी तरह एक पत्रकार भी अपनी सेवा कर रहे हैं लेकिन आए दिन पुलिस वाले तुम जैसे पत्रकार बहुत देखे हैं ऐसा कहकर पत्रकारों को बड़ी आसानी से जलील करते नजर आते हैं लेकिन जब प्रत्युत्तर में उनको भी यही जवाब मिलता है तब उनके पास अपनी मनमानी कर अपने वर्दी का रौब दिखाने का लाइसेंस होता है

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