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सरकार और सोनी सोढ़ी का झुकाव एक दूसरे की ओर, फिर भी सोनी सोढ़ी ने आखिर क्यों नहीं उठाया सिलगेर का मुद्दा?

सवालों के घेरे में सोनी सोढ़ी, आखिर क्यों नही चाहती आदिवासी ग्रामीणों की मांग पूरी हो

बीजापुर। सिलगेर में सीआरपीएफ कैंप के विरोध में सड़कों पर उतरे ग्रामीणों के समर्थन में बस्तर की समाज सेविका सोनी सोढ़ी ने ग्रामीणों का कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दिया या फिर यूं कहा जाए कि ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करते हुए सोनी सोढ़ी ग्रामीणों की मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए मध्यस्थता का काम कर रही थी लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि सोनी सोढ़ी ने इन ग्रामीणों की जो मांगे थी उनको सरकार के समक्ष ना रखते हुए सरकार के साथ हुई वर्चुअल बैठक को एक अलग ही मोड़ दे दिया।

दरअसल सिलगेर में आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की मांग कैंप हटाने के अलावा बिना उनकी अनुमति के सरकार द्वारा अपनी मनमर्जी करते हुए विकास की धारा बहाने का फैसला स्वयं से ले लिया, गीदम में एक महिला के साथ हुए बलात्कार और उसके बाद उसकी मौत, पुलिस जवानों द्वारा तीन ग्रामीणों पर गोली चलाना, तीन माह की एक गर्भवती महिला की डंडे से इस हद तक पिटाई करना कि उसकी मौत हो जाए इन सभी से आक्रोशित ग्रामीण सिलगेर से बिना जांच और सरकार द्वारा संतुष्टि जनक फैसले के अपना धरना खत्म करने के मूड में नहीं थे जिसके लिए सोनी सोढ़ी भी ग्रामीण आदिवासियों के समर्थन में सिलगेर पहुंची और ग्रामीणों की आवाज बनकर उनकी मांगों को पल पल कलेक्टर और सरकार के सामने रखने का काम किया। लेकिन जब मौका आया सरकार द्वारा वर्चुअल बैठक में अपनी बात रखने का तो सोनी सोढ़ी ने कहीं पर भी सिलगेर के ग्रामीणों की इन मांगों को सरकार के समक्ष नहीं रखा।

यह बात हैरत में डालने वाला तो जरूर है क्योंकि जिस समाजसेवी सोनी सोढ़ी ने स्वयं आंदोलन में जाकर ग्रामीणों की स्थिति को देखा था, उनकी मजबूरियां उनकी परेशानियों को देखकर उनकी ओर से उनका प्रतिनिधित्व करने का बीड़ा उठाया था उन्होंने आखिर अपने इस दायित्व से मुंह क्यों मोड़ लिया? इस बैठक में सोनी सोढ़ी द्वारा केवल एक मुद्दा उठाया गया जो वाकई एक बड़ा मुद्दा था। ग्रामीणों को और किसानों को होने वाली परेशानियों से अवगत कराते हुए इस मुद्दे में उन्होंने बीजापुर के गंगालूर इलाके मैं बैलाडीला के लौह अयस्क के लाल पानी का दंश झेल रहे ग्रामीणों का जिक्र किया जिसके बाद सरकार ने तुरंत उनके इस बात पर अमल करते हुए 5 करोड़ का एक प्रोजेक्ट तुरंत घोषित कर दिया। आश्चर्य वाली बात यह है

कि इस बैठक में सोनी सोढ़ी ने सीलगेर का मुद्दा नहीं उठाया, बस्तर द्वारा फर्जी मुठभेड़ में मारे गए आदिवासियों का मुद्दा नहीं उठाया, गीदम में एक लड़की के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या की गई थी जिसका आरोप स्वयं सोनी सोढ़ी और आदिवासियों ने लगाया इस मुद्दे पर भी सोनी सोढ़ी ने सरकार के सामने कोई बात नहीं रखी, जबकि इस बैठक में मृतक ग्रामीण की पत्नी बसन्ती भी उपस्थित थी और उन्होंने मुख्यमंत्री के समक्ष अपनी बात भी रखी लेकिन मुख्यमंत्री ने उनकी बात को नहीं सुना और ना ही मृतक के परिवार वालों के लिए कोई मुआवजे की घोषणा की। सिलगेर कैंप मामले में आदिवासियों की मांग पर भी मुख्यमंत्री ने अपनी कोई प्रतिक्रिया नही दी। हालांकि आदिवासियों के मुद्दे को प्रसिद्ध समाजशास्त्री बेला भाटिया ने मुख्यमंत्री के सामने उठाया तीन बिंदुओं में उन्होंने अपनी बात मुख्यमंत्री के समक्ष रखी लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए सिर्फ यह कहा कि हम बातचीत के माध्यम से ही इस मुद्दे को हल करेंगे।

वहीं जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बेला भाटिया के इन मांगों का कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया गया है।
अब यहां पर सवाल फिर एक बार यही उठता है कि आखिर इन ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करने वाली सोनी सोढ़ी ने जिनकी मांग को सहर्ष ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी अनुमति दे देते हैं उन्होंने आदिवासियों के इन मांगों को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सामने क्यों नहीं रखा? जब सोनी सोढ़ी की एक मांग पर सरकार ने तुरन्त 5 करोड़ का एक प्रोजेक्ट घोषित कर दिया ऐसे में हो सकता था कि अगर वह सिलगेर ग्रामीणों की मांग को मुख्यमंत्री के समक्ष रखती तो शायद मुख्यमंत्री उनकी इन मांगों पर भी विचार करते, पर उन्होंने तो दूर-दूर तक सिलगेर मामले का जिक्र ही नहीं किया जिससे कहीं ना कहीं आदिवासियों को आहत पहुंचा है।


आखिर क्यों सोनी सोढ़ी ने सिलगेर में चल रहे आंदोलन पर यह कहा कि सिलगेर का आंदोलन हम खत्म कर रहे हैं जबकि मूलनिवासी मंच की तरफ से जारी एक पोस्टर में इस बात का उल्लेख है कि आंदोलन पहले की तरह अब भी जारी है साथ ही मूलनिवासी मंच का कहना है कि समाज के कुछ भ्रामक तत्व व जिला दंडाधिकारी ने बीजापुर में उन्हें भ्रम में डालकर तर्रेम थाना बुलाया और उन्हें कोरोना का डर दिखाकर धमकाया गया साथ ही आंदोलन खत्म होने की भ्रामक जानकारी पूरे देश में फैला दी गई जबकि सिलगेर में आंदोलन पहले की तरह ही बदस्तूर जारी है। यह आंदोलन 27 जून तक जारी रहेगा और 28 तारीख को एक बड़ा प्रदर्शन सारकेगुड़ा में करने की बात भी कही गई है जहां वह बस्तर से सारे कैंपों को हटाने की मांग करेंगे।

इन सब तथ्यों के आधार पर बस्तर की समाज सेविका सोनी सोढ़ी खुद संदेहों के जाल में फंसती जा रही है क्योंकि जो सिलगेर ग्रामीणों की आवाज बन कर सरकार और ग्रामीणों के बीच मध्यस्थता करने के लिए आई थी उन्होंने तो उनकी परेशानियों को सरकार के सामने रखना ही जरूरी नहीं समझा।

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