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प्रदेश में किन्नरों ने लिखी पहली किताब,शब्दों ने बयां की किन्नरों की जीवन व्यथा

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किन्नर समुदाय जिन्हें हर पल हर निगाहे अलग नज़रों से देखा करती है।जिनके जीवन के सारे क़िस्से जानने के लिए हर किसी का मन बेताब रहता है।उनके जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव और बदलाव इन सभी बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।इन्हें दुनिया मे स्त्री पुरूष से अलग श्रेणी में रखा जाता है।एतएव सामान्य लोगो के दिमाग मे इन्हें लेकर न जाने कितने पश्नो ने हलचल मचाया होता है।इन्ही सारे प्रश्नों के उत्तर देने और अपनी जीवन के विशेष बातों पर पहली बार प्रदेश के किन्नरों ने पुस्तक लिखा है।यह प्रदेश का पहला ऐसा पुस्तक है, जिसे खुद किन्नरों ने लिखा है।

थोड़ी हटकर हूँ,दिखने में लेकिन
इंसान हूँ मैं,सुंदर नही जिस्म से लेकिन
रूह से इंसान हूँ मैं

प्रदेश में किन्नर समुदाय की विद्या राजपूत और रवीना बरिहा ने अपने समुदाय और जिंदगी के ऊपर “जिंदगी की दास्ता”के नाम से पूरी पुस्तक लिख दी।इस पुस्तक में किन्नरों के जीवन की हर स्थिति को शब्दों के माध्यम से दर्शाया गया है।किन्नरों के जीवन की दास्तां गद्य-पद्य और रचनाओं में समाहित कर दी है।इस पुस्तक के प्रकाशन में फिरोज अहमद का भी अमूल्य योगदान रहा है।अगर आप भी किन्नरों के जीवन के विशेष बातें, उतार चढ़ाव, और इस समाज के बीच उनके संघर्ष के बारे में जानने के लिए उत्साहित है तो इस पुस्तक को जरूर पढ़े।

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