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Silger:-सिलगेर से सुकमा तक का सफर फिर भी अपने हक की लड़ाई के लिए नही रुके आदिवासियों के कदम

बस्तर। बीजापुर और सुकमा जिले के बॉर्डर से लगे सिलगेर में कोरोना को देखते हुए आंदोलन समाप्त कर दिया है लेकिन ग्रामीणों का विद्रोह बदस्तूर जारी है ग्रामीण अब सुकमा में कम संख्या में उपस्थित होकर अपने हक के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे। बता दें सिलगेर में पिछले 27 दिनों से सरकार से अपनी जमीन को बचाने के लिए हजारों की तादाद में ग्रामीण सड़कों पर उतर आए थे जिस जंगल जमीन की सुरक्षा आदिवासी हमेशा से करते आ रहे हैं उनकी जगह को सीआरपीएफ कैंप बनाने के लिए बिना उनकी अनुमति के अधिग्रहण करना यह कहकर कि यह सरकार की जमीन है इससे आदिवासी बहुत ज्यादा आक्रोशित है उनका कहना है कि इसकी देखरेख हम करते हैं सरकार यहां नहीं आती लेकिन इसके बावजूद भी बिना ग्रामसभा लगाए बिना भू मालिक की मंजूरी लिए किस हक से यहां पर सीआरपीएफ कैंप का निर्माण कराया जा रहा है, यह जमीन हमारी है और सरकार को हमारी मांग के सामने घुटने टेकने होंगे।


नक्सली, जंगलों का गढ़ और आदिवासियों की पहचान कहे जाने वाले बस्तर में आदिवासियों से जुड़े कई रहस्य दफन है जिसके उजागर होने के डर से हर क्षण पुलिस पूरी तत्परता से तैनात होकर पत्रकारों का रास्ता रोक इस राज को राज ही बनाए रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं हमेशा नक्सलियों से जुड़े मामलों में छाए रहने वाले बस्तर में इस बार सुकमा बीजापुर सीमा स्थित सिलगेर आदिवासियों के आंदोलन का मुद्दा प्रदेश समेत पूरे देश में छाया हुआ है सिलगेर में स्थित ग्रामीण आदिवासियों के मन में इस बार जो जमीन को बचाने के लिए आग की लपटें उठ रही हैं

उन लपटों से पूरा प्रदेश अछूता नहीं रहा है और धीरे-धीरे यह मुद्दा एक बड़े आंदोलन के रूप में तब्दील होते जा रहा है। सिर्फ एक जगह के लिए ही ग्रामीण आदिवासी कैंप का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि इसके पीछे की वास्तविकता तो और भी ज्यादा खतरनाक है जिसे शायद स्थानीय मीडिया दिखा पाने में किसी कारणवश सक्षम नहीं सिलगेर मामले के पीछे की पूरी वास्तविकता जानने आईडीपी 24 न्यूज़ की टीम मौके पर पहुंची जहा कैंप हटाने के पीछे जमीन बचाने के अलावा और भी कई अहम मुद्दों से पर्दा उठा जो जानना पूरे प्रदेश के लिए बेहद आवश्यक है।

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकार जिसका सरोकार हर वो घटना से है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सरकार और जनता को प्रभावित करती है। लोगों की आवाज बन कर उनकी तकलीफों को सरकार तक पहुंचने का काम पत्रकार करते हैं लेकिन बीजापुर कलेक्टर इन पत्रकारों को ही दबाने का प्रयास करने के लिए सड़कों पर उतर आए सिलगेर में आंदोलनरत ग्रामीणों से मिलने जाने के लिए हमारी टीम को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा कलेक्टर ने तर्रेम चेक पोस्ट के पास ही हमारी टीम को यह कह कर रोक लिया कि आगे कंटेनमेंट जोन है इसलिए वहां जाने का परमिशन नहीं दे सकते।लेकिन सिलेगर से आने वाले लोगों पर रोक नहीं लगा सके।


जब हमने कलेक्टर से कहा कि पत्रकारों के लिए ऐसे कोई नियम कानून नहीं तो कलेक्टर ने साफ कहा कि ग्रामीण नहीं चाहते की पत्रकार उन तक पहुंचे वहीं जब हमने इस विषय में बस्तर की समाजसेविका सोनी सोढ़ी से बात की और यह जानना चाहा कि आखिर आप लोग क्यों यह नहीं चाहते कि मीडिया ग्रामीणों तक पहुंचकर उनकी परेशानियों को सुनें तो सोनी सोढ़ी ने कहा कि हम यहां पर पत्रकारों को बुलाने की मांग करने ही आए थे और हमने ऐसा कुछ नहीं कहा है बल्कि हम चाहते हैं कि मीडिया हमारी बातों को सरकार तक पहुंचाए इस बात को सुनकर कलेक्टर झूठ बोलने से भी पीछे नही हटे ग्रामीणों के सामने कलेक्टर के सुर ही बदल गए और ग्रामीणों से कहा कि पत्रकारों को जाने से नहीं रोका जा रहा है। लेकिन ऐसा करके ना सिर्फ कलेक्टर ने पत्रकारों की छवि खराब करने की कोशिश की है बल्कि पत्रकारों और ग्रामीणों को गुमराह करने की भी कोशिश की।


लेकिन 5 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद हमारी टीम सिलगेर में आंदोलनरत ग्रामीणों के पास पहुंची जहां पर कई नए खुलासे हुए एक ओर जहां 3 ग्रामीणों की मौत की बात उभरकर सामने आ रही है तो वहीं इस बात का भी खुलासा हुआ कि पुलिस द्वारा सिलगेर में ग्रामीणों पर इस तरह से बर्बरता पूर्व व्यवहार किया गया लाठियां बरसाये गए कि 3 माह की गर्भवती महिला की भी मौत हो गई इस मामले को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन नहीं चाहती सच लोगों तक पहुंचे यही कारण है कि पुलिस प्रशासन झूठ और मनगढ़ंत कहानी बनाकर लोगों को और सरकार को गुमराह करने की कोशिश
कर रही है और पत्रकारों को हम तक नहीं पहुंचने दिया जा रहा है। लेकिन यहाँ पर एक बात तो स्प्ष्ट है कि पत्रकारों को मौके पर जाने से रोकना यह कहीं ना कहीं कैम्प में स्थित जवानों के किसी कृत्य को कलेक्टर द्वारा छुपाने की कोशिश की ओर इशारा करती है सच को दबाने की भरकस कोशिश कलेक्टर द्वारा की जा रही है।

वहीं सूत्रों की माने तो पत्रकारों को ग्रामीणों तक नहीं पहुंचने देने का कलेक्टर का एक कारण यह भी था कि उन्हें पता था कि सोनी सोढ़ी उनसे मिलने आएगी और उनकी बातों को मानेगी। साथ ही ग्रामीणों को सिलगेर से हटाकर सुकमा में आंदोलन करने के लिए कहेगी और हुआ भी ऐसा ही कुछ जब सोनी सोढ़ी आई उसके बाद ही पत्रकारों को ग्रामीणों से मिलने के लिए जाने दिया गया। लेकिन कलेक्टर का सोनी सोढ़ी के लिए कहि गयी बात और उस बात का सच भी होना ये बात समझ से परे है।


बाहर हाल कड़ी मशक्कत के बाद सिलगेर पहुंची हमारी टीम ने ग्रामीणों से इस विषय में चर्चा की,कि आखिर जवानों के कैंप लगने से उन्हें क्या परेशानी है। कैंप लगने से उनके क्षेत्र का विकास होगा हमारे इस सवाल के जवाब में ग्रामीणों ने जो कहा यह हैरत में डाल देने वाला जवाब था ग्रामीणों का कहना है कि

कैंप के एवज में सरकार ग्रामीणों के जमीनों का अधिग्रहण करती है ग्रामीणों का कहना है कि कैंप का विरोध करने के पीछे केवल जमीन ही एक वजह नहीं बल्कि कैंप स्थित होने के बाद यहां रहने वाले जवानों द्वारा जो हमारी महिलाओं और लड़कियों का यौन शोषण किया जाता है हम उससे अपनी ग्रामीण महिलाओं और बेटियों के अस्मिता बचाने के लिए भी इसका विरोध कर रहे हैं साथ ही ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जवानों ने बिना स्थानीय लोगों को इसकी सूचना दिए और बिना जमीन मालिक को इसकी सूचना दिए रातों-रात कैंप लगा दिया एक बार हमारी स्वीकृति भी लेनी जरूरी नहीं समझी उनके इस तानाशाही रवैये से खुद को बचाने के लिए हमें फिर से सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसके अलावा ग्रामीणों ने इस कैंप के एवज में जवानों की जो करतूत है उससे परत दर परत परदा भी हटाया कई हैरत करने वाले खुलासे हुए इस बात से भी पर्दा हटा की अब तक जवानों ने कितनी ही आसपास के ग्रामीण महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया किस तरह उनके साथ बलात्कार किया लेकिन इस मामले पर होने वाली कार्यवाही भी ठंडे बस्ते में चली गई सिलगेर में आंदोलनरत इन ग्रामीण आदिवासियों के विरोध के पीछे की वजह खुद ग्रामीणों से सुनिए और यह तय कीजिए कि इनका विरोध करना सही है या गलत

इन पूरे बातों को सुनकर यह तो स्पष्ठ हो गया कि ग्रामीण केवल एक कैंप के लिए ही बरसते पानी और तपती धूप में छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सड़कों पर उतरकर संघर्ष नहीं कर रहे बल्कि जो कुछ उन्होंने सहा है दोबारा वह उन पर ना बीते इसलिए वह सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर है तो वही इस पूरे मामले में जवानों का कहना है कि यह सारे क्रियाकलाप नक्सलियों के मार्गदर्शन में हो रहा है। अब यहां पर भी एक सवाल उठता है सवाल यह कि जिन मृतक आदिवासियों को पुलिस नक्सली करार दे रही है

उन्हीं आदिवासियों के अंत्येष्टि के लिए भूपेश सरकार ने उनके परिवार को 10 10 हजार रुपये मुआवजा दिया तो क्या एक नक्सली के परिवार को सीएम भूपेश बघेल का संरक्षण प्राप्त है जो उनके अंतिम संस्कार के लिए वह उनके परिवारों को पैसे दे रहे हैं या फिर पुलिस अपने बनाए जाल में ही फंस चुकी है। बाहर हाल इस मामले पर भी कुछ दिन पहले नारायणपुर जिले के कांग्रेस विधायक चंदन कश्यप ने भी एक बयान दिया था जिसमें उन्हें ने कहा था कि पुलिस ग्रामीणों को नक्सली बता रही है पुलिस नारायणपुर के ओरछा और नारायणपुर ब्लाक में कई लोगों को घरों से ले जाकर नक्सली घोषित कर रही हैं।

सिलगेर मामला जितना सुनने में आसान नजर आ रहा है जमीनी वास्तविकता उससे कहीं ज्यादा पेचीदा है बावजूद इसके भी ग्रामीणों ने कोरोना महामारी को देखते हुए अपनी सूझबूझ के साथ सिलगेर से आंदोलन स्थगित कर सुकमा में कम संख्या में विद्रोह जारी रखने की बात कही है और यह विद्रोह तब तक जारी रहेगा जब तक उन्हें उनके हक में फैसला नहीं मिल जाता पर यह लड़ाई कब तक जारी रहेगी 27 दिनों से आंदोलनरत इन ग्रामीण आदिवासियों की सुधि लेने कोई भी स्थानीय अधिकारी उन तक नहीं पहुंचे जब विपक्षियों ने ग्रामीणों से मिलने की पहल की तब सरकार भी नींद से जागी और सरकार ने इस मामले में 20 दिन बाद एक्शन लिया जिससे ग्रामीणों के मन में और आक्रोश व्याप्त है

बस्तर सांसद दीपक बैज के अध्यक्षता में गठित जनप्रतिनिधियों की टीम के सामने भी जो वार्तालाप ग्रामीणों की हुई है उसमें भी बहुत ठंडे तरीके से कार्यवाही हो रही है।
बहरहाल अब देखना यह होगा कि बीजापुर सुकमा बॉर्डर के सिलगेर से उठी आंदोलन की यह आग कब तक शांत होती है और सरकार कब इन ग्रामीणों को उनका सन्तुष्टिजनक जवाब दे पाती है।

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