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आदर्श नारीत्व का प्रतीक वट सावित्री व्रत-अरविन्द तिवारी…..

अम्बिकापुर से अभिषेक सिंह की रिपोर्ट iDP24 NEWS…

अम्बिकापुर – वैसे तो हिन्दू धर्म में अनेकों पर्व और त्यौहार उत्साह पूर्वक मनाये जाते हैं मगर वट सावित्री का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिये खास महत्व रखता है। ये त्योहार उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या ही वट सावित्री अमावस्या कहलाती है। इस दिन शनि जयंती मनाने की भी परंपरा है। वट सावित्री व्रत को कुंवारी और विवाहित दोनों ही महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इसमें जहां कुंवारी कन्यायें इच्छानुसार वर की कामना के लिये ये व्रत करती हैं, तो वहीं शादीशुदा महिलायें अपने अखंड सौभाग्य और परिवार की समृद्धि के लिये इस व्रत को रखती हैं। जो पत्नी इस व्रत को सच्ची श्रद्धा के साथ करती है उसे ना केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि उसके पति के सभी कष्ट भी दूर हो जाते हैं। आज के दिन सौभाग्यवती महिलायें सोलह श्रृंगार करके बरगद , पीपल , के पेड़ की विधिवत पूजा कर पेंड़ के तने के चारो ओर पीले रंग का पवित्र कच्चा धागा एक सौ आठ बार बांधती और फेरे लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों। प्यार , श्रद्धा और समर्पण का यह भाव हमारे देश में सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी के लिये प्रसिद्ध है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना जाता है। वटवृक्ष दीर्घायु , अमरत्व , ज्ञान , निर्वाण का भी प्रतीक है । इस कारण पति की दीर्घायु और अपनी अपनी अखंड सौभाग्यवती के लिये वटवृक्ष का पूजा , आराधना इस व्रत का मुख्य अंग बन गया है। तत्पश्चात वट सावित्री की कथा सुनती हैं और पूजन समाप्ति पर घर के बड़े बुजुर्गो का आशीर्वाद लेती हैं। बिना कथा सुने यह व्रत अधूरा माना जाता है। इस व्रत की कथा के अनुसार इसी दिन देवी सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी।

जानें वट सावित्री व्रत कथा

भद्र देश के अश्वपति नाम के एक राजा थे जिनकी कोई संतान नही थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिये मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। काफी लंबे समय से राजा अपनी बेटी सावित्री के लिये एक उपयुक्त वर खोजने में असमर्थ था तो इस प्रकार उसने सावित्री को अपना जीवनसाथी स्वयं खोजने के लिये कहा। अपनी यात्रा के दौरान सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पाया। सत्यवान अल्पायु और वेदज्ञाता थे। राजा अंधा था और उसने अपना सारा धन और राज्य खो दिया था। सावित्री ने सत्यवान को अपने उपयुक्त साथी के रूप में पाया और फिर अपने राज्य में लौटकर राजा को अपनी पसंद के बारे में बताया। उसकी बात सुनकर नारद मुनि ने राजा अश्वपति से कहा कि इस संबंध को मना कर दें क्योंकि सत्यवान का जीवन बहुत कम बचा है और वह एक वर्ष में मर जायेगा। राजा अश्वपति ने सावित्री को उसके लिये किसी और को खोजने के लिये कहा। लेकिन स्त्री गुणों के एक तपस्वी और आदर्श होने के नाते उसने इंकार कर दिया और कहा कि वह केवल सत्यवान से ही शादी करेगी , भले ही उसकी अल्पायु हो या दीर्घायु। इसके बाद सावित्री के पिता सहमत हो गये और सावित्री और सत्यवान विवाह बंधन में बंध गये। सत्यवान से विवाह के पश्चात सावित्री अपने सास , ससुर और पति की सेवा में लगी रही। एक साल बाद जब सत्यवान की मृत्यु का समय आने वाला था तब सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया और सत्यवान की मृत्यु के निश्चित दिन पर वह उसके साथ जंगल में चली गयी। एक बरगद के पेड़ के नीचे जब सावित्री की गोद में सत्यवान सोया था। तभी सत्यवान के प्राण लेने के लिये यमलोक से यम के दूत आये पर सावित्री ने अपने पति के प्राण नही ले जाने दिये। तब यमराज खुद सत्यवान के प्राण लेने आये और सत्यवान की आत्मा को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे। उसके पीछे पीछे सावित्री भी चल पड़ी। यमराज के बहुत मनाने के बाद भी सावित्री नहीं मानीं तो यमराज ने उन्हें वरदान मांगने का प्रलोभन दिया। सावित्री ने अपने पहले वरदान में सास-ससुर की दिव्य ज्योति मांँगी। दूसरे वरदान में उनका छिना हुआ राज-पाट मांगा और दूसरे तीसरे वरदान में सत्यवान के पुत्र की मांँ बनने का वरदान मांगा जिसे यमराज ने तथास्तु कह स्वीकार कर लिया। इसके बाद भी जब यम सत्यवान को साथ ले जाने लगे तो सावित्री ने उसे यह कहते हुये रोक दिया कि उसके पति सत्यवान के बिना बेटा पैदा करना कैसे संभव है ? यमराज अपने दिये वरदान में फंँस गये थे और इस तरह उन्हें सावित्री की भक्ति और पवित्रता देखकर सत्यवान को पाश से मुक्त कर दिया और अदृश्य हो गये। सावित्री अब उस वट वृक्ष के पास पहुंची तब तक वट वृक्ष के नीचे पड़े सत्यवान के मृत शरीर में जीव का संचार हुआ और वह उठकर बैठ गया। इसी तरह सत्यवान के माता पिता की आंखें भी ठीक हो गई और उन्हें उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया। उस दिन के बाद से वट सावित्री व्रत सैकड़ों हिंदू विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पतियों की दीर्घायु के लिये मनाया जाता है। जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिये यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिये उसकी परिक्रमा की इसलिये वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है। उस दिन के बाद से वट सावित्री व्रत सभी हिंदू विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु के लिये मनाया जाता है।

वट वृक्ष का महत्व

पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वट का वृक्ष त्रिमूर्ति को दर्शाता है। इसकी जड़ों में भगवान ब्रह्माजी , तने में विष्णुजी और पत्तों में शिवजी का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन करने , व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है। भगवान बुद्ध को भी इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। अत: वट वृक्ष को ज्ञान , निर्वाण व दीर्घायु का पूरक भी माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रयाग के अक्षयवट , नासिक के पंचवट , वृंदावन के वंशीवट , गया में गयावट और उज्जैन के सिद्धवट। इन पाँचों वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है।

वट सावित्री का महत्व

वट सावित्री की कथा हर परिस्थिति में अपने जीवनसाथी का साथ देने का संदेश देता है। इससे ज्ञात होता है कि पतिव्रता स्त्री में इतनी ताकत होती है कि वह यमराज से भी अपने पति के प्राण वापस ला सकती है। वहीं सास-ससुर की सेवा और पत्नी धर्म की सीख भी इस पर्व से मिलती है। मान्यता है कि इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और उन्नति के लिये यह व्रत रखती हैं।

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