हाई कोर्ट ने अतुल अर्थर को दिखाई क़ानून की हद,C.N.I मसीह समाज को डराने की चाल हुई बेनकाब

मसीह समाज को डराने की कोशिश नाकाम
बिलासपुर।छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, बिलासपुर ने अतुल अनुराग अर्थर द्वारा दायर रिट याचिका (WPC No. 1861/2025) पर महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और चर्च अथवा मसीह समुदाय को डराने की कोशिशें स्वीकार्य नहीं हैं।






माननीय न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू द्वारा पारित आदेश में न्यायालय ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता अतुल अर्थर एवं अन्य को चर्च में प्रार्थना करने का अधिकार तो है, लेकिन केवल उन्हीं समयों में जो चर्च की वैध रूप से गठित प्रबंधन समिति द्वारा सभी के लिए तय किए गए हों।
अदालत ने अतुल अर्थर की मंशा को समझा
न्यायालय के समक्ष यह तथ्य भी सामने आया कि अतुल अर्थर द्वारा यह आरोप लगाया गया था कि उन्हें चर्च में प्रवेश से रोका जा रहा है, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिना प्रमाण के लगाए गए आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं होते।
समानांतर नियंत्रण की कोशिश को किया खारिज
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि
👉 चर्च का संचालन पहले से निर्वाचित (elected) प्रबंधन समिति द्वारा किया जा रहा है,
👉 और याचिकाकर्ता द्वारा चर्च को समानांतर रूप से नियंत्रित करने या प्रबंधित करने की कोशिश कानून के दायरे में स्वीकार्य नहीं है।
मसीह समुदाय C.N.I डयसिस को डराने की रणनीति विफल
यह आदेश उन लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो यह सोचते हैं कि झूठे मुकदमों और दबाव की राजनीति से मसीह समाज को डराया जा सकता है।
माननीय न्यायालय ने यह साबित कर दिया कि सच्चाई के सामने गलत इरादे ज्यादा दिन टिक नहीं सकते।
रिट याचिका हुई निरस्त
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने रिट याचिका को निस्तारित (Disposed of) कर दिया और याचिकाकर्ता को अन्य मामलों के लिए वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की बात कही।
न्यायपालिका पर भरोसा मजबूत
इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि
✔️ कानून व्यवस्था सर्वोपरि है
✔️ चर्च और मसीह समाज की गरिमा की रक्षा होगी
✔️ और डर, भ्रम व दबाव की राजनीति को न्यायालय से कोई समर्थन नहीं मिलेगा









