अभावों के बीच इतिहास रच रहीं अर्जुंदा की वेटलिफ्टिंग बालिकाएं….जीत का परचम लहराया, लेकिन आज भी सरकारी मदद की बाट जोह रहीं खिलाड़ी

गुंडरदेही.
शब्बीर रिज़वी की रिपोर्ट
संसाधनों के घोर अभाव, बुनियादी सुविधाओं की कमी और लगातार सरकारी उपेक्षा के बावजूद अर्जुंदा की वेटलिफ्टिंग बालिकाएं इतिहास रचती जा रही हैं। असुरक्षित सामुदायिक भवन में सीमित साधनों के बीच अभ्यास कर रही ये खिलाड़ी न केवल बालोद जिले और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर रही हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मजबूत पहचान दर्ज करा चुकी हैं। इसके बावजूद आज तक न उन्हें स्थायी और सुरक्षित प्रशिक्षण भवन मिल पाया है और न ही प्रशासन या जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई ठोस सहायता।

खेलो इंडिया चयन ट्रायल में चमकी अर्जुंदा की प्रतिभा
वेटलिफ्टिंग स्पोर्ट्स अकादमी अर्जुंदा से जुड़ी बालिकाओं ने 6 जनवरी को आयोजित खेलो इंडिया जनजातीय खेल (छत्तीसगढ़ चयन ट्रायल) में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इस ट्रायल में अकादमी की चार बालिकाओं ने भाग लिया, जिनमें से दो बालिकाओं का चयन छत्तीसगढ़ टीम के लिए किया गया। ये दोनों खिलाड़ी फरवरी माह में आयोजित राष्ट्रीय खेलो इंडिया जनजातीय खेलों में बालोद जिला एवं छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करेंगी। यह उपलब्धि न केवल अकादमी बल्कि पूरे जिले के लिए गर्व का विषय है।
राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार बढ़ती भागीदारी

अर्जुंदा की बालिकाओं की उपलब्धियों का सिलसिला लगातार आगे बढ़ता रहा है। पिछले महीने दिसंबर में अकादमी की तीन बालिकाओं ने अंडर-19 स्कूल नेशनल गेम्स में भाग लिया। इससे पहले पिछले वर्ष ओपन राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में पूरे बालोद जिले से केवल एक ही खिलाड़ी का चयन हुआ था, जो अर्जुंदा की ही थी। वहीं इस वर्ष बालोद जिले से दो बालिकाओं का चयन ओपन राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप के लिए हुआ है, जो 4 फरवरी से 12 फरवरी तक मोदीनगर, उत्तर प्रदेश में आयोजित की जाएगी। उल्लेखनीय है कि ये दोनों खिलाड़ी भी अर्जुंदा स्थित वेटलिफ्टिंग अकादमी से ही हैं।
खेलो इंडिया ट्राइब नेशनल गेम्स में भी अर्जुंदा की मजबूत उपस्थिति
इसके अतिरिक्त 14 फरवरी से शुरू होने वाले खेलो इंडिया ट्राइब नेशनल गेम्स, जिनका मेजबान राज्य छत्तीसगढ़ है, के लिए भी अकादमी की दो बालिकाओं का राष्ट्रीय स्तर पर चयन हुआ है। लगातार हो रहे इन चयनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वेटलिफ्टिंग स्पोर्ट्स अकादमी अर्जुंदा अब प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की एक मजबूत नर्सरी बन चुकी है।
आंकड़े बताते हैं अर्जुंदा की बढ़त
यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। पिछले वर्ष पूरे बालोद जिले से ओपन नेशनल वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता के लिए केवल एक बालिका और अंडर-19 स्कूल नेशनल के लिए दो खिलाड़ियों का चयन हुआ था। वहीं इस वर्ष पूरे जिले से ओपन नेशनल और यूथ गेम्स के लिए दो बालिकाओं का चयन हुआ, जबकि अंडर-19 स्कूल नेशनल में तीन बालिकाओं ने भाग लिया। ओपन प्रतियोगिताओं के लिए निर्धारित मापदंड अर्जुंदा की बालिकाएं लगातार हासिल कर रही हैं। विद्यालयीन राष्ट्रीय खेलों में भी अकादमी की बालिकाएं जिले को पदक दिला चुकी हैं। वर्ष 2021 से अब तक बालोद जिले में वेटलिफ्टिंग (भारोत्तोलन) खेल में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक बालिकाओं का चयन इसी अकादमी से हुआ है।
*उपलब्धियों के पीछे कठिन संघर्ष*
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद इन खिलाड़ियों की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। बालिकाएं आज भी सामुदायिक भवन में सीमित और असुरक्षित संसाधनों के बीच अभ्यास करने को मजबूर हैं। न तो उनके पास आधुनिक प्रशिक्षण उपकरण हैं, न स्थायी भवन और न ही चिकित्सा, पोषण एवं यात्रा जैसी मूलभूत सुविधाओं की समुचित व्यवस्था।
कोच का समर्पण बना सफलता की नींव
इन बालिकाओं की सफलता के पीछे कोच प्रकाश देशमुख का महत्वपूर्ण योगदान है। वे पिछले तीन वर्षों से अपने गांव पीरीद से प्रतिदिन लगभग 16 किलोमीटर दूर अर्जुंदा पहुंचकर बालिकाओं को नियमित प्रशिक्षण दे रहे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका समर्पण और अनुशासन इन बेटियों के सपनों को नई दिशा दे रहा है।
नारे बहुत, सहयोग शून्य
स्थानीय खेल प्रेमियों और अभिभावकों का कहना है कि यदि समय रहते जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि इन होनहार खिलाड़ियों की ओर गंभीरता से ध्यान दें, तो अर्जुंदा की ये बालिकाएं राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश और प्रदेश का नाम रोशन कर सकती हैं। एक ओर सरकार “बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ” और “खेलो इंडिया” जैसे नारे देती है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर जिला और राज्य का प्रतिनिधित्व कर रही इन बालिकाओं को आज तक कोई ठोस सरकारी सहायता नहीं मिल सकी है।*
अब जवाबदेही तय होने का वक्त
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जीत का परचम लहराने वाली इन बेटियों की आवाज़ पर प्रशासन और जनप्रतिनिधि कब संज्ञान लेते हैं। क्या इन्हें सुरक्षित प्रशिक्षण भवन, आधुनिक संसाधन और सम्मानजनक सुविधाएं मिलेंगी, या फिर इनका संघर्ष यूं ही उपेक्षा के अंधेरे में दबा रह जाएगा—यह आने वाला समय तय करेगा।









