महासमुंद में वन विभाग ने गर्मियों की आगजनी पर पाया काबू…डीएफओ मयंक पांडेय की सक्रिय निगरानी

महासमुंद। गर्मियों के मौसम में हर साल बढ़ती आगजनी की घटनाओं पर इस बार महासमुंद वन विभाग ने प्रभावी नियंत्रण पा लिया है। खेतों में पराली जलाने या झाड़ियों में लगी आग अक्सर जंगल तक फैलकर भारी नुकसान करती थी। इस बार विभाग की नई रणनीति और जमीनी सक्रियता ने हालात में सकारात्मक बदलाव लाया है।
डीएफओ मयंक पांडेय खुद मैदान में उतरकर आग बुझाने का काम कर रहे हैं। वे अपनी गाड़ी में फॉग मशीन रखते हैं और आग लगने की सूचना मिलते ही तुरंत मौके पर पहुंचते हैं। उनके साथ उनका ड्राइवर भी लगातार सक्रिय सहयोग करता है।
आगजनी की घटनाओं में 80 प्रतिशत कमी
वन विभाग की तत्परता का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। 15 फरवरी से 7 अप्रैल 2026 तक आगजनी की घटनाओं में लगभग 80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। पिछले साल 2025 में कुल 284 घटनाएं हुई थीं, जबकि इस साल यह संख्या काफी घट गई है।
जंगल और वन्यजीवों के लिए खतरा
महुआ इकट्ठा करने के लिए लगाई जाने वाली आग जंगलों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रही है। इससे न सिर्फ पेड़-पौधे नष्ट होते हैं, बल्कि हिरण, तेंदुआ, भालू, जंगली सूअर और पक्षियों जैसे वन्यजीव भी प्रभावित होते हैं। इन हालातों से निपटने के लिए वन विभाग का मैदानी अमला दिन-रात काम करता है और कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर आग पर काबू पाता है।
फायर कंट्रोल के लिए विशेष अभियान
वन विभाग ने 15 फरवरी से 15 अप्रैल तक “नो फायर अभियान” चलाया। इसके तहत 150 चौकीदार, 70 बीट गार्ड और 25 डिप्टी रेंजर व रेंजर तैनात किए गए। आग बुझाने के लिए 101 फायर ब्लोअर उपलब्ध थे, लेकिन जरूरत के अनुसार अतिरिक्त 19 ब्लोअर खरीदे गए। कर्मचारियों को जूते, टॉर्च और अन्य आवश्यक सुविधाएं देकर 24 घंटे अलर्ट रखा गया।
ओडिशा से समन्वय और सरायपाली पर निगरानी
वनमंडलाधिकारी ने ओडिशा के नुआपड़ा और बरगढ़ वन अधिकारियों के साथ मिलकर संयुक्त रणनीति तैयार की। सरायपाली क्षेत्र में पहाड़ी और घने जंगल होने के कारण आग लगने की घटनाएं अधिक होती हैं। इस क्षेत्र पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।
सैटेलाइट अलर्ट और नागरिक सहयोग
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट से आग लगते ही अलर्ट कंट्रोल रूम तक पहुंचता है। वहां से संबंधित रेंजर को तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं।







