Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ में कानून का खुला मखौल: पुलिस–रजिस्ट्रार की मिलीभगत से करोड़ों का शैक्षणिक घोटाला,FIR दबाने का आरोप -लोकायुक्त में विस्फोटक शिकायत

A blatant mockery of the law in Chhattisgarh: An educational scam worth crores was perpetrated by collusion between the police and the registrar, and allegations of suppressing the FIR were leveled – an explosive complaint to the Lokayukta.

रायपुर | छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कानून, प्रशासन और पुलिस व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने वाला एक अत्यंत गंभीर मामला सामने आया है। एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था से जुड़े करोड़ों रुपये के आर्थिक घोटाले, फर्जी दस्तावेज़ों,जाली सील-मोहर,अवैध संचालन और खुले आपराधिक कृत्यों के बावजूद पुलिस द्वारा FIR दर्ज न किया जाना अब राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया है।

इस पूरे प्रकरण में छत्तीसगढ़ लोक आयोग (लोकायुक्त) के समक्ष छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 8(1) के अंतर्गत एक विस्तृत, दस्तावेज़-समर्थित और शपथपत्र सहित शिकायत प्रस्तुत की गई है, जिसमें पुलिस अधिकारियों और रजिस्ट्रार कार्यालय की भूमिका को सीधे तौर पर संदिग्ध बताया गया है।

कानून को कुचलने की सुनियोजित कहानी
🔥 सरकारी आदेश निरस्त होने के बावजूद अवैध राज

दिनांक 29/09/2025 को पारित आदेश को उप सचिव, वाणिज्य एवं उद्योग विभाग, नवा रायपुर द्वारा दिनांक 01/12/2025 को स्पष्ट रूप से निरस्त (Set Aside) कर दिया गया था।
इसके बावजूद कुछ व्यक्तियों ने स्वयं को अधिकृत बताकर फर्जी लेटरहेड, जाली सील-मोहर और कूटरचित दस्तावेज़ों के माध्यम से संस्था पर कब्ज़ा बनाए रखा।

➡️ यह कृत्य सीधे तौर पर संगठित अपराध (Organized Crime) की श्रेणी में आता है।

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सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण की पृष्ठभूमि में entity[“people”,”पद्मनी भोई साहू”,”ias officer chhattisgarh” का नाम भी विभिन्न प्रशासनिक विवादों के संदर्भ में चर्चा में रहा है।
सूत्रों का कहना है कि पूर्व में सीजीएमएससी से जुड़े मामलों तथा पीएससी से संबंधित विवादों में उनका नाम सामने आ चुका है, और इन्हीं कारणों से उनकी गतिविधियाँ जांच एजेंसियों के रडार पर बताई जा रही हैं।


सूत्र यह भी संकेत दे रहे हैं कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा चल रही निगरानी के दायरे में उनका नाम आने की अटकलें लगाई जा रही हैं।हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उभर रहे तथ्यों ने प्रशासनिक संरक्षण और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

🔥 चार माह की फीस ग़ायब — करोड़ों की हेराफेरी
विद्यालय में लगातार लगभग चार माह तक छात्रों से ली गई फीस को वैध स्कूल बैंक खाते में जमा नहीं किया गया।


इस दौरान-न लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया

न ऑडिट

➡️ यह सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और आपराधिक विश्वासघात का गंभीर मामला है।

🔥 ताला तोड़कर स्कूल में घुसपैठ * पुलिस मूकदर्शक

दिनांक 07 अक्टूबर को नामजद व्यक्तियों द्वारा स्कूल का ताला तोड़कर अवैध प्रवेश किया गया।
इस घटना की तत्काल सूचना थाना सिविल लाइन, रायपुर को दी गई, परंतु-

न FIR

न गिरफ्तारी

न सुरक्षा

सूत्रों के अनुसार, यह भी आरोप सामने आ रहे हैं कि अरुण पानालाल को विद्यालय परिसर से जुड़े विवादों में अतुल अर्थर, शशि वाघे, सपना जॉर्ज एवं रुपाली यादव द्वारा कथित रूप से शासन स्तर पर होम चर्च से संबंधित प्रकरण लड़ने के लिए आर्थिक एवं अन्य प्रकार के सहयोग का प्रस्ताव दिया गया!
सूत्रों का यह भी कहना है कि इन गतिविधियों को एक पुलिस निरीक्षक की मिलीभगत से अप्रत्यक्ष संरक्षण प्राप्त होता रहा, जिसके कारण आज तक गंभीर आरोपों के बावजूद प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई।

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि विद्यालय परिसर का ताला तोड़ने, कथित रूप से गुंडों के साथ प्रवेश करने, तथा हथौड़ी जैसे औज़ारों के साथ फोटो व वीडियो फुटेज में दिखाई देने जैसी घटनाओं के बावजूद, संबंधित व्यक्तियों पर कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई।
वीडियो एवं फोटो साक्ष्य विद्यालय कर्मचारियों द्वारा उपलब्ध कराए जाने के बाद भी खुला संरक्षण मिलता प्रतीत होना अब प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

➡️ शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस का मौन समर्थन इन अपराधियों को लगातार मिलता रहा।

सबसे गंभीर सवाल: FIR क्यों नहीं?

संज्ञेय अपराधों के स्पष्ट तथ्यों, लिखित शिकायतों, वीडियो फुटेज और दस्तावेज़ों के बावजूद-

❓ FIR क्यों नहीं दर्ज की गई?

❓ किसके दबाव में कार्रवाई रोकी गई?

❓ क्या पुलिस और रजिस्ट्रार कार्यालय ने जानबूझकर अपराध को संरक्षण दिया?

यह स्थिति छत्तीसगढ़ लोक आयोग अधिनियम, 2002 की धारा 2(ज) के अंतर्गत स्पष्ट “कदाचार (Misconduct)” है।

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का सीधा संदेश

माननीय उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि-
यदि किसी शिकायत में संज्ञेय अपराध प्रथम दृष्टया दिखाई देता है, तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है। पुलिस के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है।

FIR दर्ज न करना:

कर्तव्यहीनता

अधिकारों का दुरुपयोग

और व्यक्तिगत जवाबदारी को जन्म देता है।

यह ‘निरंतर अपराध’ है – समय किसी को नहीं बचाएगा
यह मामला Continuing Offence है:

  • फर्जी संचालन
  • आर्थिक नुकसान
    आज भी जारी है।
  • अवैध कब्ज़ा

➡️ ऐसे मामलों में समय-सीमा (Limitation) लागू नहीं होती
➡️ दोषियों की जवाबदेही कभी भी तय की जा सकती है

लोकायुक्त से निर्णायक कार्रवाई की मांग

शिकायतकर्ताओं ने लोकायुक्त से मांग की है कि

  1. पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
  2. FIR दबाने वाले पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय हो
  3. फर्जी दस्तावेज़ व जाली सील-मोहर पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए
  4. करोड़ों रुपये की वित्तीय हानि की रिकवरी व ऑडिट कराया जाए

चेतावनी भरा संदेश

यह मामला अब केवल एक संस्था या व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा।
यह कानून के शासन बनाम सत्ता के दुरुपयोग की लड़ाई बन चुका है।
यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि
छत्तीसगढ़ में कानून प्रभावशाली अपराधियों के सामने झुक गया है।

Desk idp24

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