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प्रेतात्मता बताकर बीमार बेटी का जीवन किया खराब

जयपुर। सुख मेंं प्राय:कर परमात्मा और देवी- देवताओं को बेशक याद नहीं किया जाता हो, मगर परेशानियोंं मंें अनेक लोग इनकी पूजा- अर्चना करके उन्हें खुश करने का प्रयास करते है। मगर यह फार्मुला हर बार काम नहीं करता। मरीज की हालत सीरियस होने पर आखिरी स्टेज में रोगी को चिकित्सक के पास ले जाया करता है। ऐसे में पेसेंट का उपचार बड़ा मुश्किल हो जाता है। कई बार रोगी की मौत भी हो जाती है। यह बात अनेक लोगोें के गले से बेशक नहीं उतरती हो, मगर ऐसी ही व्यथा का मामला इन दिनों जयपुर के जे.के.लॉन अस्पताल में बड़ा चर्चित हो रहा है।

घटना के अनुसार सिद्धि भार्गव नामक बारह साल की एक युवती जो कि श्ोखावाटी इलाके की रहने वाली है, हाल ही में तेज बुखार की शिकार हो गई थी । पेसेंट के पिता कन्हैया लाल अपने आप को शनि देव का उपाशक बताया करते थ्ो, अपनी बीमार बेटी का उपचार झाड़ा लगा कर अपने प्रयासोंे को आजमाने लगे। तांत्रिक बाप का मानना था कि इस तरह का केस कोई मैडिकल बीमारी का नहीं होता सही में किसी प्रेतात्मा से जुड़ा होता है। इस तरह के रोगियोें को आधुनिक चिकित्सक ठीक नहीं कर सकते। मगर मंत्र विद्या से बड़ी सी बड़ी बीमारी का आसानी से उपचार कर उन्हें ठीक किया जा सकता है।

देखा जाए तो तांत्रिकोंे के पास इस तरह के केसेज क े आंकड़े उपलब्ध नहीं है, जिनसे उनके दावों को सही साबित किया जाए। इस दिलचस्प मामले में पेसेंट सिद्धि भार्गव के तांत्रिक पिता शुरू मेें एलोपैथिक विधि सें उपचार कराने पर विश्वास नहीं करते थ्ो। अपने टोटकों की मदद से कोई खतरनाक बीमारी को ठीक करने का दावा करते रहे। करने लगे। कई दिनों तक यही सब कुछ चलता रहा और तेज बुखार ने इस बच्ची को जकड़ लिया। समय पर ईलाज नहीं होेने पर बीमारी बढती गई। बेटी की जान सिर पर आने पर तांत्रिक ने उसे नीम का थाना अस्पताल मेंे दिखाया। वहां के चिकित्सकों ने यह केस सीरियस बताया और परिजनोें को कहा कि बच्ची की जान बचानी हो तो इसे तुरंत जयपुर के जे.के.लॉन अस्पताल ले जाना होगा। तभी रोगी को रेफर कर दिया गया।

सिद्धि भार्गव इस अवस्था में बेहोशी की अवस्था में आ गई थी। चिकित्सक हैरान थ्ो। इनकी विश्ोष टीम ने सिद्धि भार्गव का उपचार शुरू कर दिया। इनका कहना था कि पेसेंट को कई सारे सिम्टम्स कोई खतरनाक बीमारी का संकेत कर रहे थ्ो। सिद्धि की जान बचाने के लिए उसे मैडिकल की लेटेटेस्ट मशीनों का सर्पोट लेने की आवश्यकता थी। अस्पताल की सघन उपचार इकाई में उसकी तरह- तरह की जांचें शुरू हो गई। चिकित्सकों को शक था कि इस बच्ची को ब्रेन टीबी या कैंसर हो सकता है। इस बात की पुष्टि के लिए बायस्पी की की गई। इनमें विश्ोष जांच जो कि बोन मैरोंं से संबंधित थी, जिसके सैम्पल लेकर सवाई मानसिंह मैडिकल कॉलेज की प्रयोग शाला में भिजवा दिया। दुखी तांत्रिक चुप था। डॉक्टरोें की टांट के बाद उसका व्यवहार काफी बदल गया था।

उसका एक ही सवाल हुआ करता था कि उसकी बेटी मर तो नहीं जाएगी। किसी भी तरह इसे बचालो। हमारे घर की घर लक्ष्मी है। इसके जाने पर परिवार की रोनक खत्म हो जाएगी। चिकित्सक बताते हैं कि यदि सिद्धि भार्गव को समय पर यहां लाया जाता तो इसकी बीमारी का ईलाज आसानी से हो सकता था। मगर लेट पर लेट। अंधविश्वास पर भरोसा करके वह अपनी बेटी क े लिए खतरा बढाता रहा। उनका कहना था कि यदि एक दिन लेट और हो जाते अस्पताल कीजगह श्मशान ले जाना पड़ता। बौन मैरों के केस में पेसेंट के शरीर में असामान्य कोशिकाएं स्वस्थ्य उत्तकोें को नष्ट करने लगती है। बोन मेरो स्पंज जैसा टिश्यू होता है, जो मानव शरीर में इसकी मौजूदगी होती है। इसका कार्य बड़ा ही महत्वपूर्ण होता है।

Desk idp24

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