Chhattisgarh

EXCLUSIVE INVESTIGATION | मिशन स्कूल विवाद में बड़ा खुलासा? निलंबित प्राचार्य, कथित फर्जी दस्तावेज, धर्मांतरण शिकायतें और अधिकारियों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

धर्मांतरण संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

रिपोर्ट: स्पेशल इन्वेस्टिगेशन डेस्कगौरेला-पेंड्रा-मरवाही | 25 जुलाई 2026क्या गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में शिक्षा व्यवस्था के नाम पर ऐसा खेल चल रहा है, जिसने सैकड़ों विद्यार्थियों के भविष्य को संकट में डाल दिया है? क्या कुछ अधिकारियों की कथित लापरवाही या मिलीभगत के कारण शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई? और क्या अल्पसंख्यक शिक्षण संस्था के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी की गई?इन सवालों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।

Related Articles

छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ एजुकेशन (CDBE) ने मुख्यमंत्री को विस्तृत शिकायत सौंपकर पूरे मामले की स्वतंत्र, उच्च स्तरीय और समयबद्ध जांच की मांग की है। शिकायत में शिक्षा विभाग, विद्यालय प्रबंधन, कथित फर्जी दस्तावेजों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।पहला सवाल: निलंबन के बाद भी शैक्षणिक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर?CDBE का आरोप है कि निलंबित प्राचार्य भावना आर्थर द्वारा निलंबन अवधि के दौरान कक्षा 10वीं एवं 12वीं के विद्यार्थियों की अंकसूची एवं अन्य शैक्षणिक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए।

यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो विद्यार्थियों के प्रमाण-पत्रों की वैधता और उनके भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।दूसरा सवाल: विदेश यात्रा की अनुमति किस आधार पर?संस्था का दावा है कि भावना आर्थर बिना वैधानिक प्रबंधन समिति की अनुमति के विदेश गई थीं, जिसके बाद उन्हें निलंबित किया गया। शिकायत में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि उन्हें शिक्षा विभाग से अवकाश स्वीकृत हुआ, तो क्या वैधानिक प्रबंधन की अनुमति का सत्यापन किया गया था?

इस संबंध में आधिकारिक पक्ष अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।तीसरा सवाल: क्या फर्जी लेटरहेड और नियुक्ति पत्रों का इस्तेमाल हुआ?CDBE ने आरोप लगाया है कि कुछ व्यक्तियों द्वारा कथित रूप से फर्जी लेटरहेड, फर्जी हस्ताक्षर, फर्जी नियुक्ति पत्र और अन्य दस्तावेजों के माध्यम से शासन एवं प्रशासन को गुमराह किया गया। संस्था ने इन दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराने की मांग की है ताकि सत्य सामने आ सके।चौथा सवाल: धर्मांतरण संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं?शिकायतकर्ताओं का दावा है कि अतुल आर्थर के विरुद्ध कथित धर्मांतरण गतिविधियों को लेकर पहले भी पुलिस और अन्य सक्षम अधिकारियों को लिखित शिकायतें दी गई थीं।

उनका आरोप है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्ष का पक्ष भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।यदि शिकायतें वास्तव में दर्ज हुई थीं, तो यह जांच का विषय है कि उन पर क्या कार्रवाई हुई और यदि नहीं हुई तो उसके कारण क्या थे।पांचवां सवाल: अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे प्रश्नCDBE का कहना है कि जिला शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारियों को समय-समय पर शिकायतें दी गईं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

संस्था ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि यह भी जांच की जाए कि क्या वैधानिक प्रबंधन समिति और उसके पदाधिकारियों का विधिसम्मत सत्यापन किया गया था या नहीं।यदि जांच में किसी अधिकारी द्वारा कर्तव्य में लापरवाही, शिकायतों की अनदेखी या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो उनके विरुद्ध विभागीय एवं वैधानिक कार्रवाई की मांग की गई है।विद्यार्थियों का भविष्य सबसे बड़ा मुद्दाइस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष कक्षा 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों का भविष्य है।

यदि शैक्षणिक अभिलेखों या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की अनियमितता सिद्ध होती है, तो इसका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ सकता है।मुख्यमंत्री से प्रमुख मांगें

• पूरे मामले की स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच।• जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका की विभागीय जांच।

• कथित फर्जी दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच।• विद्यार्थियों की अंकसूची एवं प्रमाण-पत्रों का सत्यापन।

• दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों एवं अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई।

• जांच पूरी होने तक विद्यालय का संचालन केवल वैधानिक प्रबंधन समिति के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए।

अब सबकी निगाहें सरकार परयह मामला केवल एक विद्यालय का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, विद्यार्थियों के भविष्य और कानून के शासन से जुड़ा है। यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सही सिद्ध होते हैं, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मामला बन सकता है।

वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं, तो जांच से स्थिति स्पष्ट होगी।अब देखना यह है कि राज्य सरकार और संबंधित विभाग इस मामले में किस प्रकार की जांच कराते हैं और क्या शिकायतों में उठाए गए सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से सामने आते हैं।

(अस्वीकरण: इस रिपोर्ट में वर्णित धर्मांतरण, फर्जी दस्तावेज, प्रशासनिक मिलीभगत और अन्य गंभीर आरोप शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों एवं उपलब्ध शिकायतों पर आधारित हैं। इन आरोपों की पुष्टि किसी न्यायालय या सक्षम जांच एजेंसी द्वारा अभी नहीं की गई है। संबंधित पक्षों का पक्ष उपलब्ध होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)

Surendra Sahu

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!