Chhattisgarh

सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं – एक कहानी सत्य की छत्तीसगढ़ डायोसिस

"शशि वाघे एवं अतुल अर्थोर के दावों के बीच आधिकारिक आदेशों ने स्पष्ट की वास्तविक स्थिति"

कहते हैं कि एक गाँव में दो दीपक जलते थे। एक दीपक तेल से जलता था, दूसरा सत्य से। तेल वाला दीपक तेज़ रोशनी देता था, लोग उसकी चमक देखकर उसकी ओर दौड़ पड़ते थे। सत्य का दीपक धीमा था, लेकिन उसकी लौ कभी बुझती नहीं थी।

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समय बीतता गया। आँधी आई, तूफ़ान आया, झूठ की चमक फीकी पड़ गई। जो दीपक तेल से जल रहा था, वह बुझ गया। लेकिन सत्य का दीपक आज भी जल रहा है।

जीवन और समाज में भी यही होता है।

कुछ समय तक अफवाहें सच लगती हैं। ऊँची आवाज़ में बोले गए शब्द लोगों को प्रभावित कर देते हैं। कागज़ों का ढेर भी कई बार लोगों को भ्रमित कर देता है। लोग सोचते हैं कि शायद यही सत्य है। लेकिन सत्य को अपनी रक्षा के लिए शोर नहीं करना पड़ता। सत्य का सबसे बड़ा साथी समय होता है।

पिछले कुछ समय से छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ एजुकेशन (CDBE) को लेकर समाज, शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच अनेक प्रकार की चर्चाएँ, दावे और अलग-अलग बातें सामने आईं। इससे भ्रम का वातावरण बना। कई लोगों ने बिना पूरे तथ्य जाने अपनी राय बना ली।

लेकिन समय ने एक बार फिर वही सिखाया जो इतिहास सदियों से सिखाता आया है—सत्य छिप सकता है, हार नहीं सकता।

जब आधिकारिक अभिलेख, वैधानिक प्रक्रियाएँ और सक्षम प्राधिकारी के आदेश सामने आए, तब वास्तविकता स्वयं बोलने लगी। किसी को कुछ सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। सत्य ने स्वयं अपना परिचय दे दिया।

आज यह अवसर किसी की हार या जीत का नहीं है। यह अवसर आत्मचिंतन का है। हमें यह सीख देता है कि किसी भी विवाद में निर्णय भावनाओं, अफवाहों या एकपक्षीय जानकारी के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाण, कानून और सत्य के आधार पर होना चाहिए।

हम सभी शिक्षकों, कर्मचारियों, अभिभावकों और समाज के सम्मानित नागरिकों से विनम्र निवेदन करते हैं कि संस्था की गरिमा, विद्यार्थियों के भविष्य और समाज की एकता को सर्वोपरि रखें। किसी भी जानकारी को स्वीकार करने से पहले उसके आधिकारिक स्रोत की पुष्टि अवश्य करें।

आइए, कटुता नहीं—सत्य का साथ दें। विवाद नहीं—विश्वास को मजबूत करें। विभाजन नहीं—एकता का संदेश दें।

अंत में…

“झूठ की उम्र लंबी दिखाई दे सकती है,
लेकिन उसका अंत निश्चित होता है।
सत्य को जीतने के लिए किसी हथियार की आवश्यकता नहीं होती,
क्योंकि समय स्वयं उसका सबसे बड़ा साक्षी है।
सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।
और अंततः जीत हमेशा सत्य की ही होती है।”

Surendra Sahu

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