बिलासपुर: हाईकोर्ट ने वन्यजीव तस्करी के 3 आरोपियों को किया बरी

बिलासपुर / छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सूरजपुर जिले के तीन आरोपियों — राजेश तिवारी, सुनील सिंह और रामचंद्र खैरवार — को वन्यजीव तस्करी के आरोपों से बरी कर दिया। यह निर्णय न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की एकल पीठ ने सुनाया।
मामला और प्रारंभिक सजा
23 जनवरी 2014 को पुलिस ने तीनों आरोपियों को मोटरसाइकिल पर जाते समय रोका था। तलाशी के दौरान उनके पास से तेंदुए की खाल बरामद होने का दावा किया गया। इस आधार पर आरोपियों के खिलाफ वाइल्ड लाइफ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1972 की धारा 51(1-ए) के तहत मामला दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें तीन साल की सजा और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, जिसे बाद में सेशन कोर्ट ने बरकरार रखा।
हाईकोर्ट ने फैसला क्यों पलटा
हाईकोर्ट ने मामले के साक्ष्यों की गहन समीक्षा की और कई गंभीर खामियां पाईं:
- तेंदुए की खाल को सील नहीं किया गया और मालखाने का कोई दस्तावेज पेश नहीं हुआ।
- यह स्पष्ट नहीं था कि खाल सुरक्षित रखी गई या नहीं।
- स्वतंत्र गवाहों ने जब्ती या पंचनामे का समर्थन नहीं किया।
- जांच अधिकारी के बयान में विरोधाभास पाए गए।
- खाल को कब और कैसे फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया, इस पर स्पष्टता नहीं थी।
- धारा 313 सीआरपीसी के तहत आवश्यक सवाल आरोपियों से नहीं पूछे गए।
- फॉरेंसिक रिपोर्ट पर आरोपियों से कोई सवाल नहीं किया गया।
कोर्ट ने पाया कि यह सभी प्रक्रियात्मक कमियां आरोपियों के बचाव के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि महत्वपूर्ण साक्ष्य पर आरोपी से सवाल नहीं किया जाता, तो उसे उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा। साक्ष्यों में गंभीर संदेह और कमी पाई गई। इसलिए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया और ट्रायल तथा अपीलीय कोर्ट के फैसले रद्द कर दिए गए।









