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Silger-आदिवासियों की हितैषी होने का दावा करने वाली सोनी सूरी सिलगेर आंदोलन के 1 साल पूरा होने के बाद भी नहीं पहुंची सिलगेर

बस्तर। 17 मई 2021 का वह काला दिन जिसे प्रदेश समेत देश भी शायद ही कभी भुला पाएगा। सिलगेर कैंप के विरोध में उतरे सैकड़ों आदिवासियों के ऊपर पुलिस की बर्बरता पूर्वक चली गोलीयों ने,ना सिर्फ आदिवासियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाया बल्कि, उनके आवाज को दबाने का भरकस प्रयास भी किया गया। और इस घटना में आदिवासियों ने अपने 4 साथी भी खोए।

साल भर होते-होते यह मामला शासन प्रशासन के लिए ठंडा जरूर पड़ गया लेकिन, सिलगेर आदिवासियों के मन में आग आज भी 1 साल पहले की तरह ही है। अगर कुछ बदला है तो सिर्फ आदिवासियों के हितैषी कहने वाले समाजसेवियों का रवैया! जिन्होंने सिलगेर के ज्वलंत मुद्दे को देखते हुए वहां पहुंचकर आदिवासियों के हितैषी बनने का ढोंग कर अपनी रोटियां तो सेक ली लेकिन,उसके बाद धीरे-धीरे इस मामले से, आदिवासियों की तकलीफों से इस तरह से पल्ला झाड़ दिया कि आज साल भर बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों की सुधि लेने वह सिलगेर नहीं पहुंच पाए।

दरअसल सिलगेर गोलीकांड को घटे 1 साल पूरा हो चुका है। जिसके चलते बीते 17 मई 2022 को आदिवासियों ने फिर एक बार आंदोलन कर अपनी आवाज शासन-प्रसाशन तक पहुंचाने का प्रयास किया है। लेकिन दुख की बात तो यह है कि आदिवासियों की हितैषी कहने वाली सोनी सुरी जो कभी आदिवासियों का आवाज बनने की बात कहती थी वह इस आंदोलन में शामिल होना तो दूर आदिवासियों का हाल-चाल जानने भी उनके पास नहीं पहुंची। बड़ी संख्या में एक बार फिर आदिवासी ग्रामीण एकत्रित हुए और उन्होंने एक बार फिर अपने मांग को पुरजोर तरीके से उठाया लेकिन,इस बार आदिवासी हितैषी सोनी सुरी दूर-दूर तक इस आंदोलन में नजर नहीं आई।

आखिर ऐसी क्या वजह है कि सोनी सूरी इन आदिवासियों के पास जाना जरूरी नहीं समझती? आदिवासियों की हक की बात करने वाली सोनी सुरी को आखिर ऐसा क्या हुआ कि सिलगेर मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ है इसके बावजूद भी वह इस मामले से पल्ला झाड़े हुए हैं? यह बात सुनने में जितना हैरान करने वाला है,उतना ही ज्यादा आदिवासी ग्रामीणों को इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो गया है कि, क्यों वह जिस सोनी सुरी को अपना मसीहा समझते थे वह उनके दुख में शामिल होने नहीं पहुंची?

और तो और आदिवासियों की मांग पूरी हुए बिना ही सोनी सुरी ने यह भी कहा था कि सिलगेर का मामला खत्म हो चुका है। जबकि जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयां करती है। वहीं सूत्रों की बात करें तो खबर यह भी आई थी कि सोनी सुरी कांग्रेस में शामिल होने वाली है!

तो क्या आदिवासियों की आवाज बनने का जो दावा सोनी सुरी ने किया था वह केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को फलीभूत करने के लिए था?कांग्रेस में सोनी सुरी को अगर वाकई शामिल कर लिया जाता है तो यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा कि सिलगेर में जो सोनी सूरी बड़ी-बड़ी बात आदिवासियों के हक में कहती थी वह केवल इसलिए क्योंकि वह आदिवासियों की नहीं बल्कि अपनी बात सरकार के सामने रखकर अपना लाभ देख रही थी।

बहरहाल इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो नहीं पता लेकिन 1 साल बीतने के बाद सिलगेर आंदोलन में सोनी सूरी का नहीं पहुंचना यह किसी अन्य दिशा में इशारा जरूर कर रही है।

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